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मृगशिरा
“मृग का शिर”
23°20′ वृषभ — 6°40′ मिथुन
विंशोत्तरी स्वामी: मंगल · 7 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: सोम
एक दृष्टि में
| विषय | मान | स्रोत |
|---|---|---|
| विस्तार | 23°20′ वृषभ — 6°40′ मिथुन | गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′ |
| राशि | वृषभ · मिथुन राशि-स्वामी: शुक्र · बुध | गणित — ऊपर के विस्तार से |
| विंशोत्तरी स्वामी | मंगल 7 दशा-वर्ष | मानक विंशोत्तरी क्रम |
| अधिष्ठातृ देवता | सोम सोम, चन्द्र | बृहत् संहिता 97.4 |
| गण | देव | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| योनि | सर्प | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| नाड़ी | मध्य | मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| वर्ण | सेवा-जन — सेवक वर्ग | बृहत् संहिता 15.30 |
| कर्म-गुण | मृदु योग्य कर्म: सुरत-विधि, वस्त्र-आभूषण, मंगल-कार्य तथा गीत — मैत्री हेतु हितकर। | बृहत् संहिता 97.10 |
| कूर्म-चक्र दिशा | मध्य | बृहत् संहिता 14.2 |
| प्रतीक | मृग-शिर | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| तारे | λ and φ Orionis | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
जातक का स्वभाव
इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।
चपल, चतुर, भीरु, पटु, उत्साही, धनी तथा भोगी।
इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ
कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।
सुगन्धित वस्त्र, कमल, फूल, फल, रत्न, वनचर तथा पक्षी; हिरण, सोमपायी, गन्धर्व, प्रेमी तथा पत्र-वाहक।
चार पाद
प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।
| पाद | अंश | नवांश | नवांश-स्वामी | नामाक्षर |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 23°20′ वृषभ — 26°40′ वृषभ | सिंह | सूर्य | वे |
| 2 | 26°40′ वृषभ — 30° वृषभ | कन्या | बुध | वो |
| 3 | 0° मिथुन — 3°20′ मिथुन | तुला | शुक्र | का |
| 4 | 3°20′ मिथुन — 6°40′ मिथुन | वृश्चिक | मंगल | की |
गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है
देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।