सोमवार, 28 अक्टूबर 2019 · आश्विन मास, कृष्ण पक्ष
अमावस्या 09:09 बजे — आश्विन की अमावस्या
क्षण उज्जैन के लिए मिनट तक गणित है: 09:09 IST। चन्द्रमा सूर्य के साथ है, 0% प्रकाशित, स्वाति नक्षत्र में, आश्विन मास में। दिन का स्वभाव और अवधियाँ नीचे हैं।
उज्जैन के सूर्योदय पर प्रकाशित, 06:29 IST।
- अमावस्या (नव चन्द्र) 09:09 बजे
आज का व्रत-पर्व
गोवर्धन पूजा; बलि प्रतिपदा
सनातन धर्म पर्व। पंचांग-नियम: कार्तिक · शुक्ल पक्ष प्रतिपदा।
Two festivals share the first morning after Dīpāvalī. Govardhana Pūjā, or Annakūṭa — “the mountain of food” — gives thanks to the hill, the cows and the land that feed us, as Kṛṣṇa taught. Bali Pratipadā welcomes back the generous King Bali, whom Viṣṇu permitted to visit his people once a year. In Gujarat it is the first day of the new Vikrama year.
अमावस्या
अमावस्या (नव चन्द्र) 09:09 बजे
अमान्त गणना से यह आश्विन की अमावस्या है; ऊपर का क्षण स्वयं युति/वियुति का है, उज्जैन के लिए गणित।
अमावस्या पितरों की है, और किसी आरम्भ के लिए नहीं ली जाती।
सोमवती अमावस्या — सोमवार की अमावस्या
The new moon, when Sun and Moon dwell together — the day that belongs to the ancestors. Offerings of water and sesame made today reach them directly, and their blessing is sought for the family’s welfare. A new moon on a Monday (Somavatī) is especially sacred for married women, who circle the pīpal tree 108 times; on a Saturday (Śanaiścarī) Śani is propitiated with sesame oil; on a Tuesday (Bhaumavatī) debts are said to be cleared by ancestral rites.
बारह राशियों के लिए
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मेष मेष के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 7वें भाव में है — साझेदारी का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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वृषभ वृषभ के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 6वें भाव में है — विघ्न और ऋण का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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मिथुन मिथुन के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 5वें भाव में है — संतान और विद्या का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
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कर्क कर्क के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 4वें भाव में है — घर और मन की शान्ति का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
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सिंह सिंह के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 3वें भाव में है — साहस और उद्यम का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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कन्या कन्या के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 2वें भाव में है — धन और वाणी का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
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तुला तुला के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 1वें भाव में है — देह और स्वयं का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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वृश्चिक वृश्चिक के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 12वें भाव में है — व्यय और विश्राम का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
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धनु धनु के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 11वें भाव में है — लाभ और आय का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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मकर मकर के लिए चन्द्रमा का गोचर आपकी राशि से 10वें भाव में है — कर्म और प्रतिष्ठा का भाव, अनुकूल गोचरों में गिना गया; दिन के सहज रहने की संभावना है।
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कुम्भ कुम्भ के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 9वें भाव में है — भाग्य और धर्म का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
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मीन मीन के लिए चन्द्रमा आपकी राशि से 8वें भाव में है — उथल-पुथल और संयुक्त धन का भाव; श्लोक इसे अनुकूल नहीं गिनता, अतः मिश्रित फल संभव हैं — मन को स्थिर होने दें, फिर निर्णय लें।
ये बारह पंक्तियाँ केवल एक गोचर पढ़ती हैं: इस दिन के सूर्योदय पर चन्द्रमा की राशि (तुला), प्रत्येक राशि को जन्म-राशि मानकर गोचर-श्लोक से मिलाई गई — वहाँ चन्द्रमा के अनुकूल भाव 1, 3, 6, 7, 10 और 11 हैं। धीमे ग्रहों की बात ऊपर की गोचर-कथाओं में है, और व्यक्तिगत फल के लिए आपकी अपनी कुण्डली चाहिए। फल ग्रह की स्थिति एवं बल पर निर्भर करते हैं।
स्रोत: बृहत् संहिता 104.4, ग्रह-गोचर (अनु. एन. चिदम्बरम् अय्यर, 1884)
आगे के दिन
- 1 नवंबर 2019 · 4 दिन बाद बुध वक्री होता है।
- 8 नवंबर 2019 · 11 दिन बाद एकादशी (11वीं तिथि, शुक्ल पक्ष) — पारम्परिक व्रत का दिन
- 12 नवंबर 2019 · 15 दिन बाद पूर्णिमा (पूर्ण चन्द्र) 19:04 बजे
- 17 नवंबर 2019 · 20 दिन बाद संक्रान्ति — सूर्य वृश्चिक राशि में 00:51 बजे प्रवेश करता है
एक दृष्टि में पञ्चाङ्ग
- तिथि
- अमावस्या — 09:09 IST तक
- वार
- सोमवार
- नक्षत्र
- स्वाति — 01:00 (+1) IST तक
- योग
- प्रीति
- करण
- नाग
- राहु-काल छोड़ा जाता है 07:55-09:20
- यमघण्ट छोड़ा जाता है 10:45-12:11
- गुलिक छोड़ा जाता है 13:36-15:01
- अभिजित् लिया जाता है 11:48-12:33
उज्जैन में सूर्य 06:29 पर उदय हुआ और 17:52 पर अस्त होगा — दिनमान 11 घं 23 मि। चन्द्रमा स्वाति में है, 0% प्रकाशित, कृष्ण पक्ष में।
पूरा पञ्चाङ्ग, और हर नियम का स्रोत
शास्त्रीय तालिकाएँ इस दिन को क्या मानती हैं
तिथि
अमावस्या तिथियों के पूर्णा कुल की है — किसी भी पक्ष की 5, 10, 15 तिथियाँ।
अमावस्या पितरों की है, और किसी आरम्भ के लिए नहीं ली जाती।
स्रोत: बृहत् संहिता, तिथि-कर्मगुण अध्याय, श्लोक 2 — अनुवाद: एन. चिदम्बरम् अय्यर, 1884।
नक्षत्र
स्वाति चर (चलायमान) नक्षत्रों में है।
“चलायमान स्वभाव के कामों के नक्षत्र।”
स्रोत: वराहमिहिर की बृहत् संहिता, नक्षत्र-कर्मगुण अध्याय (श्लोक 6–11) — अनुवाद: एन. चिदम्बरम् अय्यर, 1884।
तालिकाएँ इस दिन को किसके लिए नामित करती हैं, और क्या छोड़ती हैं
ये चार निर्णय एक क्रम हैं, कोई अंक नहीं। यहाँ न कोई उत्तीर्णांक है, न कोई योग: शास्त्र दिन के सामने कर्मों को क्रम देते हैं, दिन को अंक नहीं देते। “अनामित” का अर्थ है कि होरा जिन तालिकाओं को उद्धृत कर सकता है वे इस दिन को उस कर्म के लिए न नामित करती हैं न वर्जित — यह न अनुमति है, न निषेध।
जो नियम लगे, और हर एक कहाँ से आया
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अमावस्या। नव चन्द्र पितरों का है और किसी आरम्भ के लिए नहीं लिया जाता।
किन कर्मों पर: विवाह · नए घर में प्रवेश · पहला मुण्डन · नामकरण · अन्नप्राशन · कर्णवेध · विद्यारम्भ · यज्ञोपवीत · व्यापार या दुकान का आरम्भ · वाहन-क्रय · भूमि-पूजन · यात्रा
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होरा की अपनी कर्म-तालिका इस कर्म के लिए सोमवार को अनुकूल वार गिनती है — बताया गया, लागू नहीं।
किन कर्मों पर: विवाह · नए घर में प्रवेश · यात्रा
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होरा की अपनी कर्म-तालिका स्वाति को इस कर्म के लिए नामित करती है; यहाँ उद्धृत श्लोक नहीं करता। किसी को रद्द नहीं किया गया।
किन कर्मों पर: विद्यारम्भ
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यहाँ उद्धृत श्लोक स्वाति को इस कर्म के लिए नामित करता है; होरा की अपनी कर्म-तालिका नहीं करती। किसी को रद्द नहीं किया गया।
किन कर्मों पर: यात्रा
बारहों कर्म, हर एक के पीछे का श्लोक पूरा छपा हुआ, और जहाँ परिपाटियाँ भिन्न हैं वे भेद — सब मुहूर्त पृष्ठ पर हैं। ऊपर कोई नियम जहाँ “नीचे” श्लोकों की बात करता है, वहाँ उसी पृष्ठ का अर्थ है।
अपनी कुण्डली के सामने दिन चुनना
शास्त्रीय मुहूर्त का आधा भाग इस दिन के चन्द्र और *आपके अपने* जन्म-नक्षत्र का सम्बन्ध है — तारा बल और चन्द्र बल — जिसे पंचांग छाप नहीं सकता, क्योंकि वह आपका जन्म नहीं जानता। वह स्तर मुहूर्त-खोज में है, आपकी अपनी कुण्डली के सामने।
ग्रह कहाँ हैं
| ग्रह | राशि | अंश | गति |
|---|---|---|---|
| सूर्य | तुला | 10°10′ | मार्गी |
| चन्द्र | तुला | 8°39′ | मार्गी |
| मंगल | कन्या | 21°18′ | मार्गी |
| बुध | वृश्चिक | 2°41′ | मार्गी |
| गुरु | वृश्चिक | 28°28′ | मार्गी |
| शुक्र | तुला | 29°53′ | मार्गी |
| शनि | धनु | 21°02′ | मार्गी |
| राहु | मिथुन | 16°36′ | वक्री |
| केतु | धनु | 16°36′ | वक्री |
सूर्योदय के समय कोई ग्रह वक्री नहीं है। राहु और केतु सदा वक्री माने जाते हैं, इसलिए उन्हें यहाँ नहीं गिना गया।
जिन ग्रहों पर दृष्टि रखी गई, उनमें से किसी ने इस दिन न दिशा बदली, न राशि।
वक्र-मार्ग परिवर्तन ग्रह की गति की दिशा बदलना है, और राशि-प्रवेश निरयण (लाहिरी) राशि-सीमा पार करना। दोनों 12:00 UTC के क्रमिक प्रेक्षणों से पढ़े गए हैं, अतः दिन गणित है और उससे सूक्ष्म कोई समय नहीं बताया गया। वक्र-परिवर्तन मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि के लिए देखा गया; राशि-प्रवेश मंगल, गुरु, शनि और राहु के लिए।
यह स्तम्भ किससे गणित हुआ
इस स्तम्भ की हर पंक्ति गणित है, लिखी हुई नहीं। पाँचों अङ्ग उज्जैन में इस दिन के वास्तविक सूर्योदय पर पढ़े गए हैं — वैदिक दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है, और दिन का नाम उसके सूर्योदय पर प्रचलित अङ्ग से पड़ता है। स्थितियाँ निरयण हैं (लाहिरी / चित्रपक्ष अयनांश), उच्च-परिशुद्धि ऐफ़ेमेरिस से; सूर्योदय और सूर्यास्त उज्जैन के ठीक निर्देशांकों के लिए उदय-गोचर विधि से गणित हैं — इसीलिए इस स्तम्भ के प्रकाशन का समय वर्ष भर बदलता रहता है। तिथि और नक्षत्र का शास्त्रीय स्वभाव, तथा बारह कर्म, केवल उन्हीं तालिकाओं को लगाते हैं जिन्हें यह मंच स्रोत सहित ज्यों का त्यों छापता है। इस पृष्ठ का कोई भाग किसी भाषा-मॉडल ने नहीं लिखा, और उस पर कुछ भी किसी तीसरे पक्ष से नहीं लाया गया।
कौन-सी घटना स्तम्भ का शीर्ष बने, यह होरा का घोषित सम्पादकीय क्रम है — पहले वक्र-मार्ग परिवर्तन, फिर राशि-प्रवेश, फिर युति/वियुति, एकादशी, संक्रान्ति, प्रदोष, व्यापक रूप से नामित मुहूर्त-दिन (छह या अधिक कर्म नामित), और अन्यथा तिथि का शास्त्रीय स्वभाव। हर घटना का हर तथ्य गणित है; क्रम केवल यह चुनता है कि कौन-सा गणित तथ्य शीर्ष पर रहे।
यहाँ के चिह्न उज्जैन के लिए गणित हैं: पूर्णिमा और अमावस्या स्वयं युति/वियुति के क्षण से, एकादशी और प्रदोष तिथि से, और संक्रान्ति सूर्य के नई राशि में प्रवेश से। पर्व ऊपर के विशेष खण्ड में उस दिन-भाग के अनुसार नामित हैं जिसमें उनकी तिथि व्याप्त होनी चाहिए — राम नवमी के लिए मध्याह्न, जन्माष्टमी और शिवरात्रि के लिए मध्यरात्रि, दीपावली के लिए प्रदोष — जैसा धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु बताते हैं। आपके घर के लिए आपके मन्दिर या सम्प्रदाय का पंचांग ही मार्गदर्शक है।
राहु-काल 07:55-09:20, यमघण्ट 10:45-12:11, गुलिक 13:36-15:01 तक। हर एक उज्जैन में इसी दिन के वास्तविक दिनमान का आठवाँ भाग है, कोई नियत घड़ी नहीं।
अभिजित् — दिन के पन्द्रह समान मुहूर्तों में आठवाँ — 11:48-12:33 तक रहता है।
पाँचों अङ्ग (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) प्रत्येक दिन के सूर्योदय पर गिने गये हैं — यही शास्त्रीय परिपाटी है, क्योंकि वैदिक दिन सूर्योदय से सूर्योदय तक चलता है और दिन का नाम उसके सूर्योदय पर प्रचलित अङ्ग से पड़ता है (मध्यरात्रि या स्थानीय दोपहर से नहीं)। स्थितियाँ निरयण हैं (लाहिरी / चित्रपक्ष अयनांश), उच्च-परिशुद्धि ऐफ़ेमेरिस से; सूर्योदय और सूर्यास्त इन्हीं निर्देशांकों के लिए उदय-गोचर विधि से गणित हैं, अतः नीचे का हर समय देशान्तर, अक्षांश और ऋतु के साथ सही-सही बदलता है। राहु-काल, यमघण्ट और गुलिक शास्त्रीय दिनमान-अष्टमांश सारणियाँ हैं, उस दिन के वास्तविक दिनमान पर लागू; अभिजित् 15 समान दिन-मुहूर्तों में 8वाँ है। तिथि 12° का चन्द्र-सूर्य अन्तर है, दिन नहीं, इसलिए एक सूर्योदय से अगले तक कोई तिथि छूट सकती है (क्षय) या दोहरा सकती है (अधिक) — यह अपेक्षित है, त्रुटि नहीं। दो परिणाम जानने योग्य हैं। तिथि के क्षय होने पर वह किसी भी सूर्योदय पर प्रचलित नहीं होती, अतः कोई एकादशी या प्रदोष यहाँ किसी मास से अनुपस्थित हो सकता है यद्यपि तिथि घटित हुई; व्रत तब किस समीप के दिन जाता है, यह क्षेत्रीय नियम तय करता है (स्मार्त और वैष्णव गणनाएँ भिन्न हैं) — इसीलिए यह पञ्चाङ्ग उसे आपके लिए खिसकाता नहीं। तिथि के अधिक होने पर वह दो क्रमिक सूर्योदयों पर प्रचलित रहती है, अतः दोनों दिन अंकित होते हैं और प्रत्येक पर जोड़े का पहला या दूसरा लिखा जाता है — चुपचाप एक चुन नहीं लिया जाता। पूर्णिमा और अमावस्या इस सबका अपवाद हैं: वे सूर्योदय की तिथि से नहीं, स्वयं युति/वियुति के क्षण से ली गई हैं (चन्द्र ठीक सूर्य के सम्मुख, या ठीक सूर्य के साथ), जो उनके साथ छपा है। प्रति चान्द्रमास ठीक एक पूर्णिमा और एक अमावस्या होती है, अतः सूर्योदय-नियम उन्हें अधिक वाले मास में दो बार छापता और क्षय वाले में पूरी तरह खो देता। ध्यान रहे कि छपा पञ्चाङ्ग व्रत का जो दिन बताये वह तब भी पिछला दिन हो सकता है जहाँ तिथि उस रात भर व्याप्त रहती है — यहाँ दिया क्षण खगोलगणित है, जिस पर कोई भी परिपाटी लागू की जा सकती है। अंकित दिन केवल वे हैं जो खगोलीय रूप से गणनीय और शास्त्रीय रूप से नामित हैं: पूर्णिमा, अमावस्या, एकादशी, प्रदोष (त्रयोदशी) और संक्रान्ति (सूर्य का राशि बदलना, प्रवेश-क्षण वाले स्थानीय नागरिक दिन पर दिखाया गया; इसे मनाने की क्षेत्रीय पुण्य-काल परिपाटियाँ भिन्न हैं)। कोई पर्व-सूची लागू नहीं है: कौन-सा पर्व किस तिथि पर पड़ता है, यह क्षेत्रीय और सम्प्रदाय-विशेष निर्णय है जो खगोलगणित से नहीं निकाला जा सकता, अतः यह पञ्चाङ्ग उसका अनुमान नहीं लगाता।
यह स्तम्भ आकाश की स्थिति बताता है और यह कि शास्त्रीय तालिकाएँ उसके लिए क्या नाम लेती हैं। यह किसी के विषय में कोई भविष्यवाणी नहीं करता, और यह चिकित्सा, क़ानूनी या वित्तीय सलाह नहीं है।