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रोहिणी

“रक्त-वर्णा”

10° वृषभ — 23°20′ वृषभ

विंशोत्तरी स्वामी: चन्द्र · 10 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: ब्रह्मा

एक दृष्टि में

विषयमानस्रोत
विस्तार 10° वृषभ — 23°20′ वृषभ गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′
राशि वृषभ राशि-स्वामी: शुक्र गणित — ऊपर के विस्तार से
विंशोत्तरी स्वामी चन्द्र 10 दशा-वर्ष मानक विंशोत्तरी क्रम
अधिष्ठातृ देवता ब्रह्मा ब्रह्मा (कमलज); बृ.सं. 15.28 में “प्रजापति का नक्षत्र” बृहत् संहिता 97.4
गण मनुष्य कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
योनि सर्प कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
नाड़ी अन्त्य मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया
वर्ण कृषीवल — कृषक वर्ग बृहत् संहिता 15.28
कर्म-गुण ध्रुव (स्थिर) योग्य कर्म: राज्याभिषेक, शांति-कर्म, वृक्षारोपण, नगर-स्थापना, धर्म-कार्य, बीज-वपन तथा अन्य स्थायी कार्य। बृहत् संहिता 97.6
कूर्म-चक्र दिशा मध्य बृहत् संहिता 14.2
प्रतीक शकट (गाड़ी) पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया
तारे Aldebaran पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया

जातक का स्वभाव

इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।

सत्यवादी, शुचि, प्रियंवद तथा स्थिर सुरूप।

इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ

कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।

सुव्रती, वणिक्, राजा, धनिक तथा गाड़ीवान; गाय-बैल-जलचर-कृषि-पाषाण-खानों के ऐश्वर्य से सम्पन्न।

चार पाद

प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।

पाद अंश नवांश नवांश-स्वामी नामाक्षर
1 10° वृषभ — 13°20′ वृषभ मेष मंगल
2 13°20′ वृषभ — 16°40′ वृषभ वृषभ शुक्र वा
3 16°40′ वृषभ — 20° वृषभ मिथुन बुध वी
4 20° वृषभ — 23°20′ वृषभ कर्क चन्द्र वु

गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है

देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।