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मघा
“महती”
0° सिंह — 13°20′ सिंह
विंशोत्तरी स्वामी: केतु · 7 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: पितर गण्डान्त
एक दृष्टि में
| विषय | मान | स्रोत |
|---|---|---|
| विस्तार | 0° सिंह — 13°20′ सिंह | गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′ |
| राशि | सिंह राशि-स्वामी: सूर्य | गणित — ऊपर के विस्तार से |
| विंशोत्तरी स्वामी | केतु 7 दशा-वर्ष | मानक विंशोत्तरी क्रम |
| अधिष्ठातृ देवता | पितर पितर | बृहत् संहिता 97.4 |
| गण | राक्षस | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| योनि | मूषक | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| नाड़ी | अन्त्य | मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| वर्ण | कृषीवल — कृषक वर्ग | बृहत् संहिता 15.28 |
| कर्म-गुण | उग्र योग्य कर्म: विनाश, धूर्तता, तथा बंधन-विष-दहन-शस्त्राघात आदि की सिद्धि। | बृहत् संहिता 97.8 |
| कूर्म-चक्र दिशा | आग्नेय | बृहत् संहिता 14.10 |
| प्रतीक | राज-सिंहासन | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| तारे | Regulus | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
जातक का स्वभाव
इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।
बहु-भृत्य, धनी, भोगी, सुर-पितृ-भक्त तथा महा-उद्यमी।
इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ
कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।
धन-धान्य सम्पन्न; भण्डारगृह; पर्वतवासी; पितृ-भक्त; वणिक्-वीर; मांसाहारी; तथा स्त्री-द्वेषी पुरुष।
चार पाद
प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।
| पाद | अंश | नवांश | नवांश-स्वामी | नामाक्षर |
|---|---|---|---|---|
| 1 गण्डान्त | 0° सिंह — 3°20′ सिंह | मेष | मंगल | मा |
| 2 | 3°20′ सिंह — 6°40′ सिंह | वृषभ | शुक्र | मी |
| 3 | 6°40′ सिंह — 10° सिंह | मिथुन | बुध | मू |
| 4 | 10° सिंह — 13°20′ सिंह | कर्क | चन्द्र | मे |
गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है
यह नक्षत्र गण्डान्त को छूता है — वह संधि जहाँ जल-राशि समाप्त होकर अग्नि-राशि आरम्भ होती है। परम्परा उस पाद में जन्म होने पर विवाह से पूर्व शान्ति कहती है। होरा ने इस नियम को किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा, और यह बात छिपाता नहीं।
देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।