2 / 27
भरणी
“धारण करने वाली”
13°20′ मेष — 26°40′ मेष
विंशोत्तरी स्वामी: शुक्र · 20 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: यम
एक दृष्टि में
| विषय | मान | स्रोत |
|---|---|---|
| विस्तार | 13°20′ मेष — 26°40′ मेष | गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′ |
| राशि | मेष राशि-स्वामी: मंगल | गणित — ऊपर के विस्तार से |
| विंशोत्तरी स्वामी | शुक्र 20 दशा-वर्ष | मानक विंशोत्तरी क्रम |
| अधिष्ठातृ देवता | यम यम, धर्म तथा मृत्यु के अधिपति | बृहत् संहिता 97.4 |
| गण | मनुष्य | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| योनि | गज | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| नाड़ी | मध्य | मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| वर्ण | चण्डाल जाति | बृहत् संहिता 15.30 |
| कर्म-गुण | उग्र योग्य कर्म: विनाश, धूर्तता, तथा बंधन-विष-दहन-शस्त्राघात आदि की सिद्धि। | बृहत् संहिता 97.8 |
| कूर्म-चक्र दिशा | ईशान | बृहत् संहिता 14.27 |
| प्रतीक | योनि | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| तारे | 35, 39 and 41 Arietis | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
जातक का स्वभाव
इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।
दृढ़-निश्चयी, सत्यवादी, स्वस्थ, दक्ष तथा सुखी।
इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ
कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।
रक्त-मांस भक्षक; क्रूर; वध-बन्धन-ताड़न में रत; भूसा-अन्न; नीच कुल में उत्पन्न; तथा सत्त्व-रहित लोग।
चार पाद
प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।
| पाद | अंश | नवांश | नवांश-स्वामी | नामाक्षर |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 13°20′ मेष — 16°40′ मेष | सिंह | सूर्य | ली |
| 2 | 16°40′ मेष — 20° मेष | कन्या | बुध | लू |
| 3 | 20° मेष — 23°20′ मेष | तुला | शुक्र | ले |
| 4 | 23°20′ मेष — 26°40′ मेष | वृश्चिक | मंगल | लो |
गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है
देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।