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विशाखा

“द्वि-शाखा”

20° तुला — 3°20′ वृश्चिक

विंशोत्तरी स्वामी: गुरु · 16 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: इन्द्राग्नी

एक दृष्टि में

विषयमानस्रोत
विस्तार 20° तुला — 3°20′ वृश्चिक गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′
राशि तुला · वृश्चिक राशि-स्वामी: शुक्र · मंगल गणित — ऊपर के विस्तार से
विंशोत्तरी स्वामी गुरु 16 दशा-वर्ष मानक विंशोत्तरी क्रम
अधिष्ठातृ देवता इन्द्राग्नी इन्द्र तथा अग्नि, संयुक्त रूप से बृहत् संहिता 97.4
गण राक्षस कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
योनि व्याघ्र कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
नाड़ी अन्त्य मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया
वर्ण चण्डाल जाति बृहत् संहिता 15.30
कर्म-गुण मिश्र योग्य कर्म: मृदु-तीक्ष्ण मिश्र वर्ग; मिश्रित फल देता है। बृहत् संहिता 97.11
कूर्म-चक्र दिशा नैर्ऋत्य बृहत् संहिता 14.19
प्रतीक तोरण अथवा कुम्भकार-चक्र पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया
तारे α, β, γ and ι Librae पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया

जातक का स्वभाव

इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।

ईर्ष्यालु, लुब्ध, तेजस्वी, वचन-पटु तथा कलहकर्ता।

इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ

कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।

लाल फूल-फल वाले वृक्ष, तिल-मूँग सहित; कपास, उड़द, चना; तथा इन्द्र-अग्नि के भक्त।

चार पाद

प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।

पाद अंश नवांश नवांश-स्वामी नामाक्षर
1 20° तुला — 23°20′ तुला मेष मंगल ती
2 23°20′ तुला — 26°40′ तुला वृषभ शुक्र तू
3 26°40′ तुला — 30° तुला मिथुन बुध ते
4 0° वृश्चिक — 3°20′ वृश्चिक कर्क चन्द्र तो

गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है

देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।