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रेवती
“सम्पन्ना”
16°40′ मीन — 30° मीन
विंशोत्तरी स्वामी: बुध · 17 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: पूषन् गण्डान्त
एक दृष्टि में
| विषय | मान | स्रोत |
|---|---|---|
| विस्तार | 16°40′ मीन — 30° मीन | गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′ |
| राशि | मीन राशि-स्वामी: गुरु | गणित — ऊपर के विस्तार से |
| विंशोत्तरी स्वामी | बुध 17 दशा-वर्ष | मानक विंशोत्तरी क्रम |
| अधिष्ठातृ देवता | पूषन् पूषा, पोषक तथा मार्ग-रक्षक | बृहत् संहिता 97.5 |
| गण | देव | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| योनि | गज | कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा |
| नाड़ी | अन्त्य | मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| वर्ण | कृषीवल — कृषक वर्ग | बृहत् संहिता 15.28 |
| कर्म-गुण | मृदु योग्य कर्म: सुरत-विधि, वस्त्र-आभूषण, मंगल-कार्य तथा गीत — मैत्री हेतु हितकर। | बृहत् संहिता 97.10 |
| कूर्म-चक्र दिशा | ईशान | बृहत् संहिता 14.27 |
| प्रतीक | मत्स्य अथवा मृदंग | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
| तारे | ζ Piscium | पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया |
जातक का स्वभाव
इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।
संपूर्णांग, सुभग, शूर, शुचि तथा अर्थवान।
इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ
कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।
जलजात फल, फूल, नमक, मणि, शंख, मोती, कमल; सुगन्धित फूल; इत्र; वणिक्; तथा नौका के कर्णधार।
चार पाद
प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।
| पाद | अंश | नवांश | नवांश-स्वामी | नामाक्षर |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 16°40′ मीन — 20° मीन | धनु | गुरु | दे |
| 2 | 20° मीन — 23°20′ मीन | मकर | शनि | दो |
| 3 | 23°20′ मीन — 26°40′ मीन | कुम्भ | शनि | च |
| 4 गण्डान्त | 26°40′ मीन — 30° मीन | मीन | गुरु | ची |
गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है
यह नक्षत्र गण्डान्त को छूता है — वह संधि जहाँ जल-राशि समाप्त होकर अग्नि-राशि आरम्भ होती है। परम्परा उस पाद में जन्म होने पर विवाह से पूर्व शान्ति कहती है। होरा ने इस नियम को किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा, और यह बात छिपाता नहीं।
देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।