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पूर्वाषाढा

“पूर्व अजेय”

13°20′ धनु — 26°40′ धनु

विंशोत्तरी स्वामी: शुक्र · 20 दशा-वर्ष अधिष्ठातृ देवता: आपः

एक दृष्टि में

विषयमानस्रोत
विस्तार 13°20′ धनु — 26°40′ धनु गणित — मेष के आरम्भ से 13°20′
राशि धनु राशि-स्वामी: गुरु गणित — ऊपर के विस्तार से
विंशोत्तरी स्वामी शुक्र 20 दशा-वर्ष मानक विंशोत्तरी क्रम
अधिष्ठातृ देवता आपः आपः (तोय), जल बृहत् संहिता 97.5
गण मनुष्य कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
योनि वानर कालप्रकाशिका अध्याय XIII, मिलान-सारिणियों द्वारा
नाड़ी मध्य मिलान-सारिणियों से — पारम्परिक, किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा गया
वर्ण अग्रज — ब्राह्मण वर्ग बृहत् संहिता 15.28
कर्म-गुण उग्र योग्य कर्म: विनाश, धूर्तता, तथा बंधन-विष-दहन-शस्त्राघात आदि की सिद्धि। बृहत् संहिता 97.8
कूर्म-चक्र दिशा पश्चिम बृहत् संहिता 14.20
प्रतीक गज-दन्त अथवा सूप पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया
तारे δ and ε Sagittarii पारम्परिक — किसी श्लोक से नहीं जोड़ा गया

जातक का स्वभाव

इस नक्षत्र में चन्द्रमा के रहते जन्मे जातक के विषय में शास्त्र-वचन। यह स्वयं श्लोक है, उसका सारांश नहीं।

इष्ट-आनंद-कलत्र, वीर तथा दृढ़-सौहृद।

इसके अधीन जन तथा वस्तुएँ

कौन से जन, पशु, स्थान, व्यवसाय तथा वस्तुएँ इस नक्षत्र के अधीन हैं — यही सूची मुण्डेन तथा प्रश्न-फलादेश का आधार है।

कोमल स्वभाव वाले; जल-मार्ग के यात्री; सत्य-शौच-धन से युक्त; सेतु-निर्माता; जल पर आजीविका करने वाले; फल-फूल-जलजात उत्पाद।

चार पाद

प्रत्येक नक्षत्र 3°20′ के चार पादों में बँटा है। जिस पाद में चन्द्रमा हो, वही नवांश राशि निश्चित करता है — राशि के बाद फलादेश का सबसे बड़ा आधार — तथा परम्परा से नामाक्षर भी। यह गणित है: 4 × 27 पाद क्रमशः एक-एक नवांश लेकर पूरे चक्र में चलते हैं।

पाद अंश नवांश नवांश-स्वामी नामाक्षर
1 13°20′ धनु — 16°40′ धनु सिंह सूर्य भू
2 16°40′ धनु — 20° धनु कन्या बुध धा
3 20° धनु — 23°20′ धनु तुला शुक्र फा
4 23°20′ धनु — 26°40′ धनु वृश्चिक मंगल

गणित — नक्षत्र i का पाद k नवांश (4i + k) लेता है

देवता, जातक का स्वभाव, प्रत्येक नक्षत्र के जन तथा वस्तुएँ, वर्ण-विभाजन, कर्म-गुण वर्ग तथा कूर्म-चक्र की दिशा — ये सब बृहत् संहिता (अध्याय 14, 15, 97 तथा 100) से लिए गए हैं, जो इसी स्थल के पुस्तकालय में श्लोक-दर-श्लोक उपलब्ध है, और प्रत्येक अपने श्लोक से जुड़ा है। विंशोत्तरी स्वामी मानक क्रम हैं; गण, योनि तथा नाड़ी मिलान-सारिणियों से हैं, अपने सन्दर्भों सहित। विस्तार, राशि, पाद तथा नवांश गणित हैं, मत नहीं। प्रतीक, तारा-पहचान तथा नामाक्षर पारम्परिक पंचांग-सामग्री हैं जिन्हें होरा ने किसी शास्त्र-श्लोक से नहीं जोड़ा — वे यह अपनी पंक्ति में स्वयं कहते हैं। यहाँ कुछ भी रिक्त स्थान भरने को गढ़ा नहीं गया।