Muhūrta Cintāmaṇi 6.21–6.38
अष्टकूट मिलान
आठ कूट और छत्तीस गुण
राम दैवज्ञ दो चन्द्रों के बीच मेल के आठ बिन्दु गिनाते हैं और हर एक को पिछले से एक गुण अधिक देते हैं — वर्ण को एक, वश्य को दो, और नाड़ी को आठ। एक से आठ तक जोड़ें तो छत्तीस: यह संख्या श्लोक की अपनी है।
- वर्ण · 2.8%
- वश्य · 5.6%
- तारा · 8.3%
- योनि · 11.1%
- ग्रह-मैत्री · 13.9%
- गण · 16.7%
- भकूट · 19.4%
- नाड़ी · 22.2%
हर सीढ़ी पिछली से एक गुण अधिक: 1 + 2 + … + 8 = 36
आठ कूट, और छत्तीस क्यों
एक ही श्लोक पूरा ढाँचा देता है। उसके बाद का सब कुछ आठ में से किसी एक की सारणी है।
वर्णो वश्यं तथा तारा योनिश्च ग्रहमैत्रकम्
गणमैत्रं भकूटं च नाडी चैते गुणाधिकाः ॥ २१ ॥
वर्ण, वश्य, तारा, योनि, राशि-स्वामियों की मैत्री, गण-मैत्री, भकूट और नाड़ी — मिलान के ये आठ कूट हैं, और क्रम से आगे वाला कूट पहले वाले से एक गुण अधिक रखता है।
चन्द्र राशि से: वर्ण, वश्य, ग्रह-मैत्री, भकूट
आठ में से चार केवल दो चन्द्र राशियों से पढ़े जाते हैं — 1, 2, 5 और 7 गुण, छत्तीस में से पन्द्रह।
द्विजा झषालिकर्कटास्ततो नृपा विशोऽघ्रिजाः
वरस्य वर्णतोऽधिका वधूर्न शस्यते बुधैः ॥ २२ ॥
मीन, वृश्चिक और कर्क ब्राह्मण राशियाँ हैं; उसके बाद क्रम से क्षत्रिय (मेष, सिंह, धनु), वैश्य (वृष, कन्या, मकर) और शूद्र (मिथुन, तुला, कुम्भ) राशियाँ हैं। वर की राशि के वर्ण से ऊँचे वर्ण वाली वधू को विद्वान् उचित नहीं मानते।
हित्वा मृगेन्द्रं नरराशिवश्याः सर्वे तथैषां जलजास्तु भक्ष्याः
सर्वेऽपि सिंहस्य वशे विनाऽलिं ज्ञेयं नराणां व्यवहारतोऽन्यत् ॥ २३ ॥
सिंह को छोड़कर सभी राशियाँ नर-राशियों के वश में हैं और जल-राशियाँ उनका भक्ष्य हैं; वृश्चिक को छोड़कर सभी राशियाँ सिंह के वश में हैं। शेष राशियों का वश्य लोक-व्यवहार से — राशियों के प्रतीक प्राणियों के परस्पर स्वाभाविक सम्बन्ध से — जानना चाहिए।
मित्राणि द्युमणेः कुजेज्यशशिनः शुक्रार्कजौ वैरिणौ
सौम्यश्चास्य समो विधोर्बुधरवी मित्रे न चास्य द्विषत्
शेषाश्चास्य समाः कुजस्य सुहृदश्चन्द्रेज्यसूर्याः बुधः
शत्रुः शुक्रशनी समौ च शशभृत्सूनोः सिताहस्करौ ॥ २७ ॥
सूर्य के मित्र मंगल, गुरु और चन्द्र हैं; शुक्र और शनि शत्रु; बुध सम। चन्द्र के मित्र बुध और सूर्य हैं; उसका कोई शत्रु नहीं; शेष सम हैं। मंगल के मित्र चन्द्र, गुरु और सूर्य हैं; बुध शत्रु; शुक्र और शनि सम। बुध के मित्र शुक्र और सूर्य हैं —
मित्रे चऽस्य रिपुः शशी गुरुशनिक्ष्माजाः समा गीष्पते
र्मित्राण्यर्ककुजेन्दवो बुधसितौ शत्रू समः सूर्यजः
मित्रे सौम्यशनी कवेः शशिरवी शत्रू कुजेज्यौ समौ
मित्रे शुक्रबुधौ शनेः शशिरविक्ष्माजा द्विषोऽन्यः समः ॥ २८ ॥
— और चन्द्र उसका शत्रु है; गुरु, शनि और मंगल सम। गुरु के मित्र सूर्य, मंगल और चन्द्र हैं; बुध और शुक्र शत्रु; शनि सम। शुक्र के मित्र बुध और शनि हैं; चन्द्र और सूर्य शत्रु; मंगल और गुरु सम। शनि के मित्र शुक्र और बुध हैं; चन्द्र, सूर्य और मंगल शत्रु; शेष (गुरु) सम।
मृत्युः षडष्टके ज्ञेयोऽपत्यहानिर्नवात्मजे
द्विर्द्वादशे निर्धनत्वं द्वयोरन्यत्र सौख्यकृत् ॥ ३१ ॥
दोनों की चन्द्र-राशियाँ परस्पर छठी-आठवीं हों तो मृत्यु का भय; नवम-पंचम हों तो सन्तान-हानि; द्वितीय-द्वादश हों तो निर्धनता। अन्य स्थितियों में यह मिलान सुखकारक है।
चन्द्र नक्षत्र से: तारा, योनि, गण, नाड़ी
शेष चार दो जन्म-नक्षत्रों से आते हैं — 3, 4, 6 और 8 गुण, छत्तीस में से इक्कीस। अकेली नाड़ी आठ की है।
कन्यर्क्षाद्वरभं यावत् कन्याभं वरभादपि
गणयेन्नवहृच्छेषे त्रीष्वद्रिभमसत्स्मृतम् ॥ २४ ॥
कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक और वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर प्रत्येक संख्या में नौ का भाग दें; शेष तीन, पाँच या सात हो तो अशुभ माना गया है।
अश्विन्यभ्युपयोर्हयो निगदितः स्वात्यर्कयोः कासरः
सिंहो वस्वजपाद्भयोः समुदितो याम्यान्त्ययोः कुञ्जरः
मेषो देवपुरोहितानलभयोः कर्णाम्बुनोर्वानरः
स्याद्वैश्वाभिजितोस्तथैव नकुलश्चान्द्राब्जयोन्योरहिः ॥ २५ ॥
अश्विनी और शतभिषा की योनि अश्व है; स्वाती और हस्त की महिष; धनिष्ठा और पूर्वाभाद्रपद की सिंह; भरणी और रेवती की गज; पुष्य और कृत्तिका की मेष; श्रवण और पूर्वाषाढ़ा की वानर; उत्तराषाढ़ा और अभिजित् की नकुल; मृगशिरा और रोहिणी की सर्प।
ज्येष्ठामैत्रभयोः कुरङ्ग उदितो मूलार्द्रयोः श्वा तथा
मार्जारोऽदितिसार्पयोरथ मघायोन्योस्तथैवोन्दुरुः
व्याघ्रो द्वीशभचित्रयोरपि च गौरर्यम्णबुध्न्यर्क्षयो
र्योनिः पादगयोः परस्परमहावैरं भयोन्योस्त्यजेत् ॥ २६ ॥
ज्येष्ठा और अनुराधा की योनि मृग है; मूल और आर्द्रा की श्वान; पुनर्वसु और आश्लेषा की मार्जार; मघा और पूर्वाफाल्गुनी की मूषक; विशाखा और चित्रा की व्याघ्र; उत्तराफाल्गुनी और उत्तराभाद्रपद की गौ। जिन दो नक्षत्रों की योनियों में परस्पर महावैर हो, वह सम्बन्ध त्याग देना चाहिए।
रक्षोनराऽमरगणाः क्रमतो मघाहिवस्विन्द्रमूलवरुणानलतक्षराधाः
मूर्वोत्तरात्रयविधातृयमेशभानि मैत्रादितीन्दुहरिपौष्णमरुल्लघूनि ॥ २९ ॥
राक्षस गण के नक्षत्र मघा, आश्लेषा, धनिष्ठा, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, कृत्तिका, चित्रा और विशाखा हैं; मनुष्य गण के तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, रोहिणी, भरणी और आर्द्रा; देव गण के अनुराधा, पुनर्वसु, मृगशिरा, श्रवण, रेवती, स्वाती तथा तीन लघु नक्षत्र हस्त, अश्विनी और पुष्य।
निजनिजगणमध्ये प्रीतिरत्युत्तमा स्या
दमरमनुजयोः सा मध्यमा सम्प्रदिष्टा
असुरमनुजयोश्चेन्मृत्युरेव प्रदिष्टो
दनुजविबुधयोः स्याद्वैरमेकान्ततोऽत्र ॥ ३० ॥
एक ही गण में प्रीति अत्युत्तम होती है; देव और मनुष्य गण के बीच वह मध्यम कही गई है; राक्षस और मनुष्य गण के बीच तो मृत्यु ही बताई गई है; राक्षस और देव गण के बीच एकान्ततः वैर होता है।
ज्येष्ठारौद्रार्यमाम्भःपतिभयुगयुगं दास्रभं चैकनाडी
पुष्येन्दुत्वाष्ट्रमित्रान्तकवसुजलभं योनिबुध्न्ये च मध्या
वाय्वग्निव्यालविश्वोडुयुगयुगमथो पौष्णभं चापरा स्याद्
दम्पत्योरेकनाड्यां परिणयनमसन्मध्यनाड्यां हि मृत्युः ॥ ३४ ॥
संस्करण की हिन्दी टीका पढ़ें
ज्येष्ठा, आर्द्रा, उत्तराफाल्गुनी और शतभिषा — प्रत्येक अपने पड़ोसी नक्षत्र (मूल, पुनर्वसु, हस्त, पूर्वाभाद्रपद) सहित — तथा अश्विनी आदि (प्रथम) नाड़ी हैं। पुष्य, मृगशिरा, चित्रा, अनुराधा, भरणी, धनिष्ठा, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाफाल्गुनी और उत्तराभाद्रपद मध्य नाड़ी हैं। स्वाती, कृत्तिका, आश्लेषा और उत्तराषाढ़ा — प्रत्येक अपने पड़ोसी (विशाखा, रोहिणी, मघा, श्रवण) सहित — तथा रेवती अन्त्य नाड़ी हैं। वर-वधू की एक ही नाड़ी हो तो विवाह अशुभ है; दोनों की मध्य नाड़ी हो तो मृत्यु होती है।
ग्रन्थ स्वयं क्या निरस्त करता है
अशुभ भकूट, गण-दोष और नाड़ी-दोष — तीनों का कथित अपवाद है। पृष्ठ केवल इन्हीं तीन श्लोकों के निरसन मानता है।
प्रोक्ते दुष्टभकूटके परिणयस्त्वेकाधिपत्ये शुभो
ऽथो राशीश्वरसौहृदेऽपि गदितो नाड्यृक्षशुद्धिर्यदि
अन्यर्क्षैऽशपयोर्बलित्वसस्रिते नाड्यृक्षशुद्धौ तथा
ताराशुद्धिवशेन राशिवशताभावे निरुक्तो बुधैः ॥ ३२ ॥
दुष्ट भकूट कहे जाने पर भी यदि दोनों राशियों का स्वामी एक हो, या दोनों राशि-स्वामी मित्र हों, और नाड़ी तथा नक्षत्र शुद्ध हों, तो विवाह शुभ है। नवांश-स्वामी बलवान् मित्र हों और नाड़ी-नक्षत्र शुद्ध हों तो भी यही बात है; राशि-वश्य के अभाव में तारा-शुद्धि से दोष दूर होता है — ऐसा विद्वानों ने कहा है।
मैत्र्यां राशिस्वामिनोरंशनाथद्वन्द्वस्यापि स्याद्गणानां न दोषः
खेटारित्वं नाशयेत्सद्भकूटं खेटप्रीतिश्चापि दुष्टं भकूटम् ॥ ३३ ॥
राशि-स्वामियों में या नवांश-स्वामियों में मैत्री हो तो गण का दोष नहीं लगता। शुभ भकूट ग्रहों के वैर को नष्ट कर देता है, और ग्रहों की प्रीति दुष्ट भकूट को।
राश्यैक्ये चेद्भिन्नमृक्षं द्वयोः स्यान्नक्षत्रैक्ये राशियुग्मं तथैव
नाडीदोषो नो गणानां च दोषो नक्षत्रैक्ये पादभेदे शुभं स्यात् ॥ ३५ ॥
राशि एक हो पर नक्षत्र भिन्न हों, अथवा नक्षत्र एक हो पर राशियाँ भिन्न हों, तो न नाड़ी-दोष लगता है न गण-दोष; और नक्षत्र एक होने पर चरण भिन्न हों तो मिलान शुभ होता है।
किसका स्नेह अधिक
अन्तिम श्लोक नक्षत्र-चक्र को तीन भागों में बाँटकर कन्या के नक्षत्र से स्नेह की दिशा पढ़ता है।
पौष्णेशशाक्राद्रससूर्यनन्दाः पूर्वार्धमध्याऽपरभागयुग्मम्
भर्ता प्रियः प्राग्युजिभे स्त्रियाः स्यान्मध्ये द्वयोः प्रेम परे प्रिया स्त्री ॥ ३८ ॥
रेवती से, आर्द्रा से और ज्येष्ठा से क्रमशः छह, बारह और नौ नक्षत्रों के समूह नक्षत्र-चक्र के पूर्व, मध्य और अपर भाग हैं। स्त्री का नक्षत्र पूर्व भाग में हो तो पति उसे प्रिय होता है; मध्य में हो तो दोनों में परस्पर प्रेम; अन्तिम में हो तो स्त्री पति की प्रिया होती है।
दो कुण्डलियाँ मिलाएँ
हर कुण्डली से केवल चन्द्र का नक्षत्र और राशि ली जाती है। साइन-इन होने पर पहली कुण्डली आपकी चुनी हुई कुण्डली से खुलती है।
इसका उपयोग कैसे करें
- बताइए कि कौन-सी कुण्डली कन्या की है: तारा और स्नेह-श्लोक उसके नक्षत्र से गिनते हैं।
- पहले सीढ़ी पढ़ें: नाड़ी और भकूट सहित कम योग, उनके बिना अधिक योग से भिन्न बात है।
- छत्तीस गुण दो चन्द्रों को नापते हैं, दो व्यक्तियों को नहीं। मंगल-दोष, सप्तम भाव और दशाएँ अलग पढ़ी जाती हैं।
यह पृष्ठ क्या नहीं करता
यह विवाह का निर्णय नहीं करता। आंशिक अंक और निर्णय-पट्टियाँ पुस्तिकाओं की परिपाटी हैं और वैसा ही लिखा गया है। मंगल-दोष, आयु, सप्तम भाव और चलती दशाएँ आठ कूटों के बाहर हैं, और कोई पृष्ठ दो परिवारों, दो स्वभावों और दो सहमतियों को नहीं तौल सकता।